राज्य में सरकार डबल इंजन की हो या सिंगल इंजन की बेईमानों के लिए पूंजी के जरिये रास्ते हमेशा सुलभ ही रहते है। पूंजी का चरित्र ही ऐसा होता है जो सरकारी मशीनरी को भी अपने रंग में रंग लेता है। आज बात हो रही है ग्राम कोलडा, विनियमित क्षेत्र, जिला उधमसिंह नगर की। जहां बेईमान पूंजीपतियों की एक कम्पनी ने ना केवल काश्तकारों/भू-स्वामियों को बहुत कम रकम देकर जमीन पर टाउनशिप बना कर बेच दी। ये सब लम्बी दास्तान का हिस्सा भर है जहां भू- स्वामियों को डरा-धमका, मार-पीट कर सब काम आसानी से कर लिया गया क्योंकि सम्बन्धित प्रशासन पीड़ितों के बदले उक्त कम्पनी के पक्ष में खड़ा रहा।
बेईमानी से सारे अनैतिक और असंवैधानिक कामों को अंजाम देने वाली इस कम्पनी का नाम है ‘‘मै. पाल मिनरल इण्डस्ट्री’’। वर्ष 2011 में इस कम्पनी ने जिला उधमसिंह नगर के ग्राम-कोलडा, तहसील किच्छा में एक टाउनशिप बनाने के लिए जमीनें खरीदनी चाही। टाउनशिप के लिए लगभग 44 एकड़ जमीन की जरूरत थी जो किसी एक काश्तकार या भू स्वामी के पास नहीं मिल सकती थी। इसलिये चिन्हिंत जगह पर जो जमीन दिखी उसमें अलग-अलग पांच काश्तकारों / भू-स्वामियों की जमीनें थी। लिहाजा सबसे बातचीत कर जमीनें खरीदनी थी और फिर जिला विकास प्राधिकरण व अन्य इकाईयों से नक्शा पास करा, व्यावसायिक आदि कर टाउनशिप विकसित करनी थी।यहां हुआ ये कि उक्त कम्पनी मालिक चूंकी पहले भी अन्य शहरों में टाउनशिप विकसित कर चुके थे तो काश्तकार उनके नाम से उन्हें जमीन बेचने को तैयार हो गये। पर भूस्वामी उनके असल चरित्र से ना वाकिफ थे और ना ही उन्हें ये पता था कि अन्य शहरों के बनाई टाउनशिप में क्या-क्या धांधलिया हुयी है। खैर डील शुरू हो गयी।
करीब 44 एकड़ भूमी में अलग-अलग भू स्वामी थे। 1- रोहताष अग्रवाल जिनकी 19.89 एकड़ जमीन, 2-रामनारायन एवं परिवार जिनकी 14 एकड़ जमीन, 3-विनोद सिंह जिनकी 5 एकड़ जमीन, 4-पृथ्वीपाल गुप्ता जिनकी 4.5 एकड़ जमीन का सौदा ‘‘मै.पाल मिनरल इंडस्ट्री’’ के साथ किसी तरह से हो गया और टाउनशिप का शुभमुहूर्त तय कर दिया गया। यहां उल्लेखनीय है उक्त टाउनशिप का एक भूभाग उत्तर प्रदेश में आता है। उसे उत्तराखण्ड में जिन नियमों के विरुद्ध इस्तेमाल किया गया यह अलग दास्तां है। वर्ष 2011 से प्लान किये गये इस टाउनशिप को जिन नियम मानकों और शासनादेशों के विरुद्ध जा कर बेचा गया ये एक लम्बी और रोचक दास्तां है। फिलहाल मौजूदा वर्ष 2019 तक ना भू-स्वामी जमीन के भुगतान को तरस रहे है बल्कि प्लाट ग्राहक भी उक्त टाउनशिप में निर्माण नहीं करा पा रहे है। ग्राहक ऐसे फंसे है कि टाउनशिप निर्माताओं की दबंगयी के चलते उनसे पैसे ले पा रहे और ना ही आगे अपने प्लांट बेच पा रहे है।
वैसे तो किसी भी धंधे में यदि बेईमान कूद पडे तो उसके बचने या फॅंस जाने के लिए सम्बंधित संविधान में ढे़रों नियम-उपनियम, धारायें-उपधारायें मौजूद है। पर काश्तकार और छोटे भू-स्वामियों को सामान्यतया इनका ज्ञान ही नहीं होता है। यदि मुश्किल से कोई जानकारी वो जुटा भी लें तो लड़ेगे कैसे। जब सूरत-ए-हाल ये हो कि सामने वाला दबंग और बत्तमीज हो और जिसके पास शासन-प्रशासन का गुप्त संरक्षण भी हो। इस बड़े मामले के कई छोटे हिस्से इस कहानी में बार-बार आते है। सारी खदीद-फरोख्त हो जाने के बावजूद पिछले 8 सालों से वैधानिक तौर पर अब भी वही का वही, वैसे का वैसा ही है जैसा टाउनशिप की कल्पना के समय रहा होगा। यह इसलिये कहना वाजिब लगता है क्योंकि नक्शे के हिसाब से टाउनशिप का मुख्यद्वार ;परिकल्पना के हिसाब से अभी भी टाउनशिप का हिस्सा है ही नहीं। ये चार सौ बीसी का एक नायाब नमूना कहा जा सकता है। क्योंकि जो शब्जबाग दिखा ‘पाम ग्रीन’ नामक टाउनशिप का प्रचार-प्रसार कर बेईमानी से बेचा गया। धरातल पर टाउनशिप कम्पनी के पास वो प्रापर्टी है ही नहीं.......
इस टाउनशिप के मुख्यद्वार की जमीन तो करीब चार एकड़ है वैसे तो व्यसायिक है जिसका सौदा 8 वर्ष पूर्व, वर्ष 2011 में 10 माह के करार पर हुआ था अब भी लटका हुआ है। यानी कि ये सौदा तब निश्चित की गयी रकम और समयावधी के हिसाब से रद्द हो चुका है। ऐसी सूरत में यह जमीन अब भी ‘मै. पालमिनरल इण्डस्ट्री’ के नाम नहीं हुई है तो मुख्यद्वार का वजूद ही नहीं रहा।
इतनी बड़ी इण्डस्ट्री के मालिकान जो 44 एकड़ पर टाउनशिप विकसित करने का दम रखते है और अन्य शहरों में ऐसे कई माॅडल खडे कर चुके है। मात्र 4 एकड़ जमीन का सौदा पिछले 8 साल से लटकाये हुए है। ये सबको हैरत में डाले हुये है कि कोई पूंजीपति/कम्पनी जिसे भविष्य में भी ऐसे कई और धंधे करने है तो क्यों अपना नाम खराब करने पर आमादा है। टाउनशिप के छोटे मगर बडे महत्वपूर्ण भू-भाग के लिये एसी लापरवाही की दो ही वजह हो सकती है। पहली ये कि - हम भूस्वामी को डरा-धमका कर छल-बल से अंततः जमीन हासिल कर ही लेंगे। हमारे रसूख के आगे शासन-प्रशासन और ग्राहक की हैसियत ही क्या जो हमारा कुछ बिगाड़ लेंगे या इसकी जुर्रत भी करेंगे। दूसरी वजह है कि कम्पनी उत्तराखण्ड से बोरिया-बिस्तर समेटकर अन्यत्र किसी राज्य में शिफ्ट करने के मंसूबे बना चुकी हो।
इस कम्पनी द्वारा बिछाये जाल की परत दर परत हकीकत जानने के लिये 10 बिंदुओ पर सूचना मांगी गयी थी जिसमें से 5 हासिल हो गयी है और 5 हांसिल होनी बांकी है। चूंकि ये सूचनाएं तहसीलदार किच्छा से आनी है। इसलिये सारी कहानी अभी कहना सम्भव नहीं है।
पर इस बावत सचिव विकास प्राधिकरण पंकज उपाध्याय से यह जानना चाहा कि जिस टाउनशिप के मुख्यद्वार की जमीन ही उक्त कम्पनी के नाम नहीं है तो क्या ये ग्राहकों के साथ चार सौ बीसी नहीं है? क्या उक्त टाउनशिप को गैर कानूनी नहीं माना जाना चाहिए? इस पर सचिव प्राधिकरण ने जो कहा वो काबिल-ए-गौर है। उनका कहना था कि बिना जांच के कोई बात कहना न्याय संगत नहीं होगा। हां यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह से प्रभावित होता है और विकास प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराता है तो नियमानुसार त्वरित कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।
Dusre amrpali ho rahe hai yah to
जवाब देंहटाएंwell done
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