शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

उत्तराखण्ड में Corona Warriors पर भारी पड़ सकते है The Corona Carrier


दुनियां भर में कोरोना वायरस की पहेली अभी ठीक से सुलझी ही नहीं पाई है इसीलिए सावधानी ही बचाव का एक मात्र विकल्प बन कर उभरा है । हर देश और देश के अलग अलग राज्य अपने अपने ज्ञान, विवेक और तकनीक से कोरोना से जीतने को आगे पीछे दौड़ ही रहे हैं । इस दौड़ में वही देश या वही राज्य थोड़ा आगे हैं जो अपनी आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक संरचना को समझ - जान कर कदम आगे बढ़ा रहे हैं ।

इस परिपेक्ष्य में उत्तराखंड को देखा जाए तो एक बड़ी समस्या राज्य के सामने यह है कि यहां कोरोना वॉरियर्स से ज्यादा यहां कोरोना कैरीयर्स ( वाहक ) मौजूद हैं । कौन हैं ये कोरोना कैरीयर्स जो कथित वॉरियर्स पर भारी पड़ सकते हैं । ये वो हैं जिनकी अनदेखी जाने - अनजाने नीतिनियन्ताओं द्वारा की जा रही है । एक तरफ तो कोरोना के डर से अस्पतालों में स्वाभाविक मौत मरने वालों का पोस्टमार्टम किया जा रहा है और दूसरी तरफ जो कोरोना के आदर्श वाहक हो सकते हैं उन पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है ।

कोरोना महामारी में ये तो साफ ही है कि इसके संक्रमण के लिए वो रोगी आदर्श वाहक हैं जो चेतनहीनता के चलते कहीं भी खांसते, छीकते या अन्य तरीकों से संक्रमण फैलाने में मददगार होते हैं । इन्ही की अनगिनत संख्या का राज्य को ना अनुमान है और ना ही इनके आदर्श वाहक होने आंकलन किया गया है ।


ये हैं राज्य में दो दशकों से गुणात्मक वृद्धि करते स्मैक और इंजेक्शन के नशे में डूबे युवा । राज्य में इनकी  बढ़ती तादात के बारे में आगे बात करेंगे पहले इनके कोएना वायरस के लिए आदर्श वाहक होने पर चर्चा कर लेते हैं । मनोवैज्ञानिक डॉ युवराज पंत कहते हैं कि - 'पहला तो यह कि खाँसी, छिक, आंखों और नाख ने पानी निकलना इनको संक्रमण  फैलाने के पहले पायदान में रखता है, फिर नशे के आदि होने के चलते ये किसी सामाजिक बैरियर या किसी भी तरह की मूल्य मान्यताओं और नैतिकता को नहीं मानते । ऐसा इसलिए होता है कि ये नशा ना मिले तो इन्हें नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, मांसपेशियों में बहुत दर्द होता है जिससे ये चिढ़चिढ़े और हिंसक हो जाते हैं' ।

डॉ युवराज आगे बताते हैं कि - 'ऐसे में कोई स्मैक का नशेड़ी युवा कोरोना पोजेटिव हुआ तो क्या कयामत हो सकती है इसे समझने के लिए यह जान लें कि ये नशा कोई अकेले नहीं करता बल्कि समूह में किया जाता है जिसके सदस्य जगह और परिस्थिति के हिसाब से बदलते भी रहते हैं । ऊपर से इनका तमाम बंधनों से मुक्त जीवन कोढ़ में खाज का काम करेगा, लॉक डाउन या सोशियल डिस्टनसिंग तो इनके लिए कोई मायने नहीं रखता है क्योंकि नैतिकता का मामला गौण है और पिटाई का कोई असर इन पर होता नहीं है' ।

उत्तराखंड में इनकी तादात पर एक नजर डालें तो स्मैक के पहले मरीज की पुष्टि  वर्ष 1999 में हुई, ये गौला नदी में खनन कार्य करने वाला एक मजदूर था । ये संख्या लगातार बढ़ती गई और पहले इसमें अधिकांश संख्या 30 से 40 वर्ष के युवाओं की रही फिर ये 15 से 40 के बीच आगई । ऐसा होने के लिए मौजूद व्यवस्था में कई कारण मौजूद है जैसे आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और अन्य कई, पर इसमे  फिर कभी चर्चा करेंगे ।

वैसे इनकी तादात का सही ब्यौरा राज्य सरकार के पास होना चाहिए पर जिस राज्य में 20 साल बाद भी 'मानसिक स्वास्थ्य नीति'  नहीं बनी वहां ऐसी उम्मीद ही बेमानी है । नशा मुक्ति केंद बताते हैं कि सटीक ब्यौरा 'समाज कल्याण विभाग' के पास होगा ।समाज कल्याण विभाग इससे अनभिज्ञता जताता है, स्वस्थ विभाग को ये प्रश्न ही पहेली जैसा लगता है, पुलिस प्रशासन के पास कुछ आंकड़े है  भी तो कुछ नशेडियों और तस्करों के मिलेजुले ।


नैनीताल जिले के हल्द्वानी में दो राजकीय चिकित्सालयों के अलावा 4 नशा मुक्ति केंद्र हैं इनके आधार पर कोई सटीक आंकड़ा सामने नहीं आता मगर कुछ गौर तो किया ही जाए । इन अस्पतालों में हर रोज एक मरीज स्मैक का आता है यानी 6 अस्पतालों में स्मैक के 6 मरीज रोजाना मानें तो साल भर में करीब 2 हजार से ज्यादा मरीज । ये है सिर्फ एक शहर की बात, हांलाकि इसमें कुछ संख्या कुमाऊं के अन्य गांवों के मरीजों की भी होती है पर ये आंकड़ा भी कम भयावह नहीं है जिनकी तादात में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही हो ।

इससे उत्तराखंड के अन्य शहर, गांव और जिलों की स्थिति का अंदाजा लगाना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं है  ।  डॉ युवराज पंत कहते हैं कि - 'कोई शक नहीं कि ऐसे पेशेंट कोरोना संक्रमण के लिए आइडियल वाहक है ऐसे में यदि स्मैक के किसी भी नशेड़ी को कोरोना होता है तो हिंसक मगर एकाकी नशेड़ी ना खुद जान पाएगा ना ही किसी को उसके संक्रमण चक्र के बारे में कुछ पता चल पाएगा' ।

कोरोना से जंग को तैयार सरकार द्वारा सेवा में लगे कोरोना वॉरियर्स इनसे कैसे निपटेंगे क्योंकि इस सवाल ने नीतिनियन्ताओं के मष्तिस्क में दस्तक भी नहीं दी है । मुस्तैदी के रूप में स्वाभाविक मौत पर कोरोना की पुष्टि के लिए पोस्टमार्टम तो किया जा रहा पर स्मैक के नशेडियों के पकड़े जाने पर उनका कोएना टेस्ट अब भी नहीं किया जा रहा है । 

इस बाबत जब हमने  हल्द्वानी में पकड़े गए दो स्मैकियों की जानकारी सब इंस्पेक्टर राहुल राठी से ली तो उन्होंने बताया कि पकड़े गए स्मैकिये जमानत पर रिहा किए गए इसलिए उनका कोरोना टेस्ट नही कराया गया, हां यदि उन्हें तो क्या किसी को भी जेल भेजा जाता तो कोरोना टेस्ट कराया जाता । ऐसे में कोरोना संक्रमण के लिए आदर्श वाहकों की जाने अनजाने अनदेखी कोरोना वॉरियर्स पर भारी पड़ सकती है ।

कोरोना में 500 करोड़ चंदा देने वाले बिरला ग्रुप की सैंचुरि मिल के 900 श्रमिक बर्बादी की कगार पर



दुनिया के लिए महामारी घोषित की गयी COVID-19 यानी कोरोना से लड़ने के लिए बहुत से लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया है। इनमें एक नाम बिरला ग्रुप का भी है। निश्चित तौर पर बिरला ग्रुप के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए, मगर यहां बिरला की चर्चा का कारण है उसकी सेंचुरी मिल में पिछले दो दशक से बदहाली में जी रहे मजदूर, जो मालिकान से अपना ​अधिकार मांग रहे हैं। लगभग 933 मजदूर अपनी मांगों को लेकर लंबे समय से संघर्षरत हैं।

पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच अधिकारों की लड़ाई कोई नई बात नहीं है, श्रम और संघर्ष की लंबी दास्तानों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। हर दौर में पूंजीपतियों ने जहाँ नए-नए तरीकों से श्रमिकों को हल्कान किया है, वहीं श्रमिकों ने भी संघर्ष की अपनी रणनीति को समृद्ध किया है। ऐसा ही एक मामला है बिरला ग्रुप की सेंचुरी मिल में श्रमिकों और मिल मालिक के बीच अपने अपने अस्तित्व की लड़ाई का है, जहाँ पिछले 8 वर्षों से श्रमिक बदहाली में जी रहे हैं।

कंपनी मैनेजमेंट का कहना है कि कुछ मजदूरों को छोड़कर सभी को पूरा वेतन मिल रहा है, मगर सच इसके उलट है। ठेके पर जो मजदूर हैं उनको कुछ भी नहीं मिल रहा है। वे अपनी जीविका किसी तरह चला रहे हैं। नाउम्मीदी में बड़ी संख्या में तो यहां से मजदूर पलायन भी कर चुके हैं।

गौरतलब है कि सेंचुरी मिल 17 अक्टूबर 2017 से से बंद है, जिसके बाद कामगारों को 6 महीने तक वेतन नहीं दिया गया, मगर बाद में आंदोलन करने के वजह से न्यायालय ने मिल मालिकान को मजदूरों को वेतन देने के लिए मजबूर किया। मगर इनमें से भी ठेके पर जो मजदूर थे, उन्हें कुछ नहीं मिला और न अब मिल रहा है।


मध्य प्रदेश में इंदौर-मुम्बई हाइवे पर कसरावध तहसील के गांव सतरती में एक जगह है खरगौन। यहाँ बिरला ग्रुप के कुमार मंगलम बिड़ला का एक बढ़ा उद्योग स्थापित है, जिसका नाम है ‘सेंचुरी यार्न एंड डेनिम टेक्सटाइल लिमिटेड’ 84 एकड़ भूमि पर इस उद्योग की स्थापना वर्ष 1993 में की गई। बेहतरीन उत्पादन और गुणवत्ता के चलते मिल ने जहाँ नए कीर्तिमान स्थापित किए, वहीं शोषण के चलते श्रमिकों के एक के बाद एक 4 यूनियनें अस्तित्व में आ गई।




लगभग 18 साल (1993 से 2011) तक छुटपुट संघर्षों के बावजूद मिल में उत्पादन सुचारू रूप से चलता रहा, पर उद्योगों में तकनीकी क्रांति के चलते कुमार मंगलम बिड़ला के लालच ने संवेदनहीनता का नया मॉडल पेश किया, परिणामस्वरूप वर्ष 2012 में नया एग्रीमेंट हुआ, जिसका एक ही मकसद था, बड़े पैमाने पर श्रमिकों की छंटनी। इसमें लिखा गया कि किसी भी श्रमिक को देशभर में बिरला समूह के किसी भी उद्योग में स्थानांतरित किया जा सकता है, पर उस नए काम को सीखने तक श्रमिक को कोई पारश्रमिक नहीं मिलेगा।



आमतौर पर श्रमिकों और मिल प्रबंधन के बीच इस तरह के एग्रीमेंट तीन- तीन साल में होते हैं, पर यहां यूनियन न होने की वजह से पहला एग्रीमेंट ही वर्ष 1999-2000 में यानी उत्पादन के 6 वर्ष बाद पहली बार तीन साल के लिए हुआ, फिर यूनियनों द्वारा मिल प्रबंधन की चाटुकारिता के चलते 5-5 साल में होने लगा।

श्रमिकों का आरोप है कि इस एग्रीमेंट की तैयारियां मिल प्रबंधन द्वारा काफी पहले शुरू कर दी गयी थीं, जिसके तहत स्थानीय प्रशासन, श्रम विभाग और दिल्ली के गलियरों में विचरने वाले जीवों के साथ गुप्त मंत्रणा कर ही श्रमिक विरोधी कदम बढ़ाया गया। इसके पश्चात् यूनियनों को विश्वास में लेकर, श्रमिकों को डरा-धमकाकर और जबर्दस्ती हस्ताक्षर लेकर छटनी का काम शुरू हुआ। इस कवायद में करीब 70 प्रतिशत श्रमिकों से जबरन हस्ताक्षर ले लिए गए।

यहां उल्लेखनीय है कि इन सभी कार्यों की रणनीति बनाने के लिए अनिल दुबे को मिल का मैनेजर नियुक्त किया गया। ये हज़रत एडवोकेट होने के साथ पेशेवर कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं, जिन्हें देशभर के पूंजीपति अपनी कम्पनी में अवैध छंटनी के लिए नियुक्त करते हैं। बताया जाता है कि इनकी नियुक्ति के बाद ही पहले कदम के तौर पर वर्ष 2012 का एग्रीमेंट अमल में लाया गया, लेकिन दूसरे कदम ने तो सभी को हैरत में डाल दिया। जिस कदम से श्रमिक हैरान थे वह था ‘सेंचरी यार्न एन्ड डेनिस टेक्सटाइल लिमिटेड’ को कोलकाता की ‘वेयरइट ग्लोबल’ को बेच देने का।




इस बात के आम होते ही मिल के 930 श्रमिक ही नहीं 100 से अधिक कर्मचारी भी मिल के अंदर ही सत्याग्रह पर बैठ मिल प्रबंधन का विरोध करने लगे। यहां ये भी साफ नजर आने लगा कि किस तरह श्रमिक यूनियनों ने दबाव, डर और संशय का माहौल बनाकर श्रमिकों के एक बड़े हिस्से को स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेकर मिल छोड़ने पर मजबूर किया। जो डटे रहे अब उन पर रिजाइन के लिए दबाव बनाया जाने लगा।



उन श्रमिकों को कहा गया कि वे खुद रिजाइन करें, वरना झूठे केस में पुलिस उठाकर ले जाएगी। इसके लिए बाकायदा श्रमिकों के शैक्षिक व नागरिकता के दस्तावेजों को झुठला कर कार्यवाहियां शुरू की गयीं, जिसके परिणामस्वरूप करीब 300 श्रमिकों को मात्र 1.5 लाख रुपए दे कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

जब जनज्वार ने मिल के मैनेजर अनिल दुबे से श्रमिक आंदोलन की वजह पूछी तो उनका कहना था कि श्रमिक 1 रुपये में मिल खरीद खुद चलाने की मांग कर रहे हैं। वहीं श्रमिकों के साथ कर्मचारियों की बात पर उन्होंने कहा सिर्फ श्रमिक ही आंदोलन कर रहे हैं। वहीं मिल बंदी और वेतन की बात पर अनिल दुबे कहते हैं, मिल खुली है पर उत्पादन नहीं हो रहा, पर हम श्रमिकों को वेतन दे रहे हैं।

वहीं कुछ श्रमिकों को मात्र डेढ़ डेढ़ लाख रुपये वीआरएस थमाकर निकाले जाने की बात को उन्होंने झुठला दिया, कहा कि ये सब आरोप झूठे हैं।




वहीं इतने लंबे समय से संघर्षरत श्रमिकों का कहना है कि अप्रैल 2017 से ही मिल मैनेजमेंट की हमें बाहर निकालने का योजना पर काम शुरू हो गया था, इसलिए दो-तीन महीने के अंदर ही लगभग 300 मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मजदूर नेता कहते हैं, अकस्मात हुई इन अप्रत्याशित घटनाओं से हम सब श्रमिक हतप्रभ थे, पर खुद को संयत कर घटनाक्रम पर पुनर्विचार किया तो पाया कि करीब 426 करोड़ कीमत की मिल दूसरी कंपनी को दो-ढ़ाई करोड़ में कैसे बेच सकते हैं।

ये भी साफ हुआ कि सरपंच से लेकर दिल्ली के गलियारों में घूमने वाले सभी तो मिल प्रबंधन के हाथों बिक चुके हैं। ऐसे में श्रमिकों के अधिकारों की लड़ाई सीमित शक्ति के साथ कैसे लड़ी जा सकती है। ऐसी सूरत में श्रमिकों को अपने राज्य और देश में चल रहे आंदोलन और उसके जनपक्षधर नेता याद आने लगे और यहीं से संघर्ष की एक नयी रणनीति बनी।

इस रणनीति के तहत अन्ना हजारे या मेधा पाटेकर को अपना नेता चुन आंदोलन का मन बनाया गया। अंततः सैकड़ों की संख्या में श्रमिक ट्रक और मोटरसाइकिलों में मेधा पाटेकर के घर पहुंचे और उन्हें स्थिति से अवगत कराया। मेधा पाटकर ने कुछ दिनों में अपनी स्थिति साफ करने का आश्वासन दिया और फिर कुछ दिन बाद आंदोलन में भागीदारी के लिए राजी हो गई।

संघर्षरत मजदूर कहते हैं हमारा जो संघर्ष 2017 से चल रहा है और मेधा पाटकर के आने के बाद इसने आंदोलन का रूप ले लिया, जो अभी तक जारी है और हमारी मंजिल मिलने तक जारी रहेगा।




नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता, लेखिका और पर्यावरणविद मेधा पाटेकर के आंदोलन की कमान संभालने से सेंचुरी मिल प्रबंधन सदमे में तो आया, पर उसने यह जाहिर नहीं होने दिया। मेधा ने पहले तो सभी यूनियनों (क्रमशः ए टैक, इंटैक, बी एम एस और स्वतंत्र श्रमिक एकता परिषद) को साथ ले कर आंदोलन चलाने का मन बनाया। पर वाम, भाजपा और कांग्रेस की यूनियनें श्रमिक विरोधी गतिविधियों में ही लगी रहीं।



मेधा पाटकर और मिल प्रबंधन के बीच मजदूर हितों के लिए शांति वार्ता हुई, फिर मिल प्रबंधन ने एक चाल चली जिसमें तीन में से कोई एक शर्त पर श्रमिकों को राजी होना था। वो शर्तें कुछ यूं थी- पहली श्रमिक स्वैच्छिक सेवानिवृत्त लेकर मिल को अलविदा कहें। दूसरी, बेची गई कंपनी ‘वेयरइट गोलोबल’ में नए सिरे से नौकरी करें और तीसरी, सेंचुरी मिल प्रबंधन घाटे में चल रही मिल को संवैधानिक तरीके से मिल श्रमिकों को ही दे दे और श्रमिक उसे खुद ही संचालित कर मुनाफा कमाएं।

श्रमिक पहली दो शर्तों को तो नकार गए, पर तीसरी शर्त भी उनके बस की कहाँ थी, मगर मेधा पाटेकर ने तीसरी शर्त पर हामी भर दी। देशभर के चुनिंदा एक्सपर्ट बुलाए गए, जिन्होंने कहा कि मिल मुनाफे में चलाई जा सकती है, पर 50 करोड़ का इन्वेस्टमेंट करना होगा।

श्रमिक आंदोलनकारियों को मेधा ने कई व्यावहारिक तरीके सुझाए जिस पर श्रमिक मिल चलाने को राजी हो गए। कंपनी को मामला अपने हाथ से खिसकता हुआ दिखाई देने लगा। श्रमिकों को संवैधानिक हल चाहिए था और मिल प्रबंधन को हर हाल में छंटनी। मामला कोर्ट पहुंचा, कई ट्रिब्यूनल ट्रायल चले।



अब कंपनी ने श्रमिक आंदोलन के जायज होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया, लेकिन कानूनी आधार पर कंपनी न केवल न्यायाधिकरण में बल्कि अपील याचिका दाखिल करने के बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भी हार गई। न्यायाधिकरण यानी ट्रिब्यूनल को यह मानना पड़ा कि यह सेंचुरी मिल का फर्ज बनता है कि वह कर्मचारियों को नियमित वेतन दे।

आज भी सेंचुरी मिल बंद है, लेकिन वेतन लेने के साथ ही श्रमिक संघर्ष की राह पर हैं। इस बीच बहुत कुछ अभूतपर्व हुआ, यह तो तय ही है कि ये लड़ाई अब किसी संवैधानिक निष्कर्ष पर पहुंचे बिना रुकने वाली नही है। अभी तो देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से युद्ध विराम चल रहा है।

श्रमिकों के आंदोलन पर जब जनज्वार ने आंदोलनकारी नेता सुखेन्द्र मड़ैया से बात की तो उन्होंने बताया कि बेहतर उत्पादन शायद इसलिए मिल मालिकान और प्रबंधन को पसंद नहीं आया कि इसमें अन्य उत्पादों के मुकाबले ज्यादा श्रमिक लगते हैं, इसलिए इसे बंद कर सीमेंट उत्पादन की योजना बनायी जा रही है, इसीलिए हमारे 300 से भी ज्यादा मजदूर साथियों से जबरन डरा—धमका कर जबरदस्ती साइन करा लिए गए थे और डेढ़ लाख रुपया देकर भगा दिया गया।

श्रमिकों के साथ—साथ कर्मचारियों के आंदोलन में शामिल होने की बात पर सुखेंद्र मड़ैया कहते हैं कि मिल के 45 प्रतिशत कर्मचारी आंदोलन में शामिल हैं जिनके स्टाम्प कोर्ट में उन्हीं की मर्जी से लगे हैं।

मिल बंदी और वेतन पर सुखेंद्र मड़ैया कहते हैं, वेतन तो मिल रहा है पर उत्पादन ठप है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मिल प्रबंधन किसी को अंदर नहीं जाने दे रहा। हमारा तो नारा ही यही था कि काम दो फिर वेतन दो।



बहरहाल श्रमिकों की इस लड़ाई में कई जनपक्षधर नेताओं ने भी साथ दिया है। किसान नेता योगेंद्र यादव से जब हमने इस सिलसिले में बात की तो उनका कहना था, श्रमिकों का आंदोलन बेहतरीन कार्यप्रणाली को दर्शाता है, यदि श्रमिकों द्वारा मिल संचालित करने वाली बात तय हो जाती तो देश में यह नए तरह का मॉडल विकसित हो जाता, जहां श्रमिक ही उस मिल के मालिक होते जहां वो वर्षों से उत्पादन करते हुए आ रहे हैं।

आंदोलन की मुख्य नेता मेधा पाटेकर से जब इस बारे में बात की तो उनका कहना था, सारी यूनियनें मिल कर लड़ती तो और बेहतर परिणाम आते, पर हमें तो इन यूनियनों ने ही धोखा दिया। अभी तक मज़बूत आंदोलन के कारण फैसले श्रमिकों के हित में ही आये हैं और मिल प्रबंधन को मुंह की खानी पड़ी है।



उन्होंने कहा कोर्ट के फैसले में मिल द्वारा अन्य को बेचे जाने को शेम अग्रीमेंट बताया गया है। श्रमिक अब दबी जुबान में यह बात भी कहने लगे हैं कि जो कंपनी कोरोना के नाम पर 500 करोड़ का दान दे सकती है, क्या वो अपने वर्षों पुराने श्रमिकों की जायज मांग नही मान सकती। वो यह भी कहते हैं कि हमें इस बात से क​तई ऐतराज नहीं है कि इसे तकनीकी रूप से समृद्ध किया जाये।


श्रमिकों की इतनी सी ही मांग है कि प्रबंधन तकनीकी सुधार के बहाने अवैध रूप से छंटनी ना करे। इस मिल में केवल मध्य प्रदेश के श्रमिक-कर्मचारी ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र आदि राज्यों के लोग भी कार्यरत हैं।

उत्तराखंड में वन्य जीवों पर कोरोना वायरस के खतरे का अलर्ट जारी

दुनियाभर में कोरोना वायरस जैसे जैसे मानव जीवन को प्रभावित करता आया है वो अब इंसानों तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी जद में वन्यजीव भी आने लगे हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग की राष्ट्रीय पशु चिकित्सा सेवा प्रयोगशालाओं ने न्यूयॉर्क स्थित ब्रोंक्स चिड़ियाघर के एक बाघ में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई है, जिसके बाद केंद्र सरकार द्वारा वाइल्डलाइफ एनिमल पर कोरोना वायरस के खतरे का अलर्ट जारी हुआ है।



अगर किसी जानवर का व्यवहार असामान्य दिखे तो उन पर सीसीटीवी कैमरा से चौबीसों घंटे निगरानी की जाए। जानवरों की देखभाल करने वालों को बिना चिकित्सा उपकरणों के उनके आसपास जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जानवरों को खाना परोसते समय भी उनसे उचित दूरी बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।प्राधिकरण ने कहा कि विशेष तौर पर स्तनधारी जीवों को कोरोना परीक्षण के लिए नामित पशु स्वास्थ्य संस्थानों में नमूनों की जांच के लिए भेजे जाने की आवश्यकता है।

इस अलर्ट के बाद उत्तराखंड मे कुमाऊं क्षेत्र के पश्चिमी वृत्त के 5 वन प्रभाग में 300 सीसीटीवी कैमरा लगाए गए हैं, जो खासकर बाघ और तेंदुए के विचरण पर बारीकी से निगरानी रखेंगे।

पश्चिमी वृत्त के मुख्य वन संरक्षक डॉ पराग मधुकर धकाते का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए अलर्ट के बाद पश्चिमी वृत्त की सभी सीमाएं सील कर दी गई है और जंगलों में कड़ी निगरानी रखी जा रही है। साथ ही कैमरे की मदद से वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर विशेष निगरानी रखने के निर्देश रेंज स्तर के अधिकारियों को दिए गए हैं।


कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखा उत्तराखण्ड के इस गांव में हो रहा सड़क निर्माण, विरोध कर रहे ग्रामीण जान देने पर उतारू

तकनीकी युग में विकास की पहली सीढ़ी यातायात के साधनों का सुलभ होना है, जिसके बिना शासन की विकास और कल्याणकारी योजनाओं का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यह तब और प्रासंगिक हो जाता है जब मामला सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों का हो, खासकर पहाड़ी क्षेत्र का मामला हो।

उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखण्ड को 20 वर्ष पूरे हो चुके हैं। यहां खासकर ग्रामीण इलाकों में जरूरतभर की भी सड़कें नहीं हैं, जो बन भी रही हैं वो डूबते को तिनके का सहारा की तरह हैं। उस पर भी शासन सत्ता का खेल ऐसा चल रहा कि ग्रामीण उससे और भी ज्यादा तकलीफ में जा रहे हैं।

ऐसा ही एक मामला सामने आया है अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट ब्लॉक में। यहां जमिनीपार गांव जोकि ईड़ा बारखाम और तिपौला के बीच के पड़ता है, में बनघट- सेलापानी-मारचूला-धारचूला के नाम से वर्ष 2003 में एक सड़क बनाने की स्वीकृति मिली थी। वर्ष 2011 में इसकी शुरूआत ही विवादों से हुई, क्योंकि इस सड़क का निर्माण ग्रामप्रधान ने बिना ग्रामवासियों की अनापत्ति लिए उनके जाली हस्ताक्षरों के जरिए शुरू करा दिया था। जब तक ग्रामवासियों को इस बात का पता चलता, तब तक 2 किलोमीटर की दूरी तक सड़क कट चुकी थी। ग्रामीणों ने जाली हस्ताक्षरों के माध्यम से सड़क की अनापत्ति लिये जाने पर आपत्ति दर्ज की तो निर्माण कार्य रुकवा दिया गया था।

वर्ष 2019 के अक्टूबर महीने में फिर से इस काम के लिए टैण्डर पड़े और 5 नवंबर को आचार संहिता लगी होने के बावजूद धारा 144 का उल्लंघन करते हुए यहां भारी भीड़ के साथ कटान कार्य शुरू करा दिया गया। जब जमीनीपार के ग्रामीणों ने इसका विरोध किया तो ठेकेदारों ने उन्हें डराया—धमकाया। मगर धमकाने के बावजूद ग्रामीण डरे नहीं और अपना विरोध जारी रखा।


इस घटना के बाद उपजिलाधिकारी द्वाराहाट की मध्यस्थता में तय किया गया कि जमिनीपार के ग्रामीण जिस तरह चाहते हैं सड़क वैसे ही काटी जाएगी। ग्रामीणों की मांग थी कि इस सड़क को बाराखाम-जामिनीपार से ही आगे बढ़ाते हुए विस्तार दिया जाए, न कि बनघट, सेलापानी को जबरदस्ती काटा जाए, और वृहद जनहित को ध्यान में रखकर कल्याणकारी योजना को अमल में लाया जाए। इसी पर विवाद भी शुरू हुआ था।

ग्रामीणों की मांग के मुताबिक जुड़ने वाले गांवों में जामिनीपार, ईड़ा, भटकोट, पैठानी, बेडूली एवं समस्त विकास खण्ड द्वाराहाट शामिल था। आपत्ति करने वाले ग्रामवासियों का तर्क यह भी था कि जहां से सड़क काटी जा रही है वहां एक भी घर नहीं बना है, जबकि जहां से सड़क काटने पर ग्रामीण जोर दे रहे हैं, वहाँ गांव के गांव बसे हैं। ऐसे में जबरदस्ती नियम विरुद्ध सड़क काटना न तो ग्रामीणों के हित में होगा और न ही उसका किसी को लाभ मिल पायेगा।


जमीनीपार के ग्रामीणों ने लगायी अपनी नापभूमि बचाने की गुहार
ग्रामीणों और ठेकेदारों की बहस और लड़ाई—झगड़े के बाद यह मामला कोर्ट तक जा पहुंचा। भुक्तभोगी ग्रामीणों का कहना है कि चूंकि जनहित के मामले में शासन सत्ता का स्वार्थ सिद्ध नहीं हो पा रहा था तो सड़क निर्माण में शामिल लोगों ने न्यायालय को भी गुमराह कर अपने हित में जांच रिपोर्ट पेश कर दी। ऐसे में फैसला भी जनभावनाओं के खिलाफ आया।

अपनी मांग के विपरीत फैसले को देखकर ग्रामीणों ने चुप्पी साध ली, मगर शासन सत्ता की दबंगई जारी रही। सड़क निर्माण में नियमों के विरूद्ध न्यायालय के फैसले का भी उल्लंघन शुरू हो गया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि सड़क फैसलानुसार ही बनेगी, पर नाप की भूमि छोड़ बेनाप की भूमि पर सड़क निर्माण किया जायेगा। कोर्ट के आदेश की भी अनदेखी होते देख एक बार फिर ग्रामीण विरोध पर ​उतारू हो गये।

सड़क निर्माण का विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि जिला प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और ठेकेदार मिलक​र हम ग्रामवासियों को झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दे रहे हैं।

इस बाबत जब उपजिलाधिकारी द्वाराहाट राजकुमार पांडेय से बात करनी चा​ही तो उनका कहना था कि सबकुछ नियमानुसार ही हो रहा है। क्या वन पंचायत और ग्राम पंचायत से अनापत्ति ली गई है? सवाल पूछने पर उनका फोन कट गया, जो कई बार लगाने के बाद भी नहीं उठा।



इस बारे में जब सड़क का निर्माण कर रहे ठेकेदार राम सिंह रावत से बात की तो उन्होंने कहा कि मैं जो कर रहा हूँ वो लोक निर्माण विभाग और उपजिलाधिकारी के आदेशानुसार कर रहा हूं।

समाचार लिखे जाने तक सड़क निर्माण के लिए ठेकेदार अपनी मशीनें चलवा रहे हैं और ग्रामीण अपनी नाप की जमीनों को बचाने के लिए मशीनों के आगे जान देने तो तैयार बैठे हैं। मगर इस सबसे बेखबर प्रशासनिक अधिकारी जैसे किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं।

गुरुवार, 5 मार्च 2020

बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर कोढ़ में खाज सा हो गया पलायन










देवभूमी कहलाने वाले उत्तराखण्ड का स्वस्थ दूर तक ठीक होता नहीं दिख रहा है । शारीरिक और मानसिक स्वाथ्य के आंकड़े बताते आरहे हैं कि हालात ठीक होने के बजाए अभी और भयावह होने वाले हैं । 20 वर्ष के वयस्क उत्तराखण्ड को नीति नियंताओं की जनविरोधी नीतियों ने कुपोषित कर डाला है । स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर शासन की उदासीनता के रोज नए परिणाम सामने आ रहे है, जिससे जनमानस के माथे की लकीरें गहरी हो चिंता और अवसाद की तरफ ले धकेल रही हैं ।

राज्य के अविकसित गांवों में स्वाथ्य सेवाओं का हाल ये है कि बीमार लोगों को ईलाज के लिए कई किलोमीटर कुर्सी या चारपाई की डोली में किलोमीटरों पैदल चल अस्पताल ले जाना पड़ता है । पर हालात अब इतनी खराब स्थिति तक ही नहीं नहीं रहे बल्कि और ज्यादा बिगड़ चुके है ।

मौजूदा हालात स्वस्थ के साथ पलायन के दर्द की कहानी भी बयां करने लगे हैं । अभी इसी सप्ताह के भीतर एक घटना घटी जिसकी तस्वीर एकदम साफ नजर आई है । इस घटना से लोग राज्य के हालात ठीक से समझ सकते हैं ।

घटना के मुताबिक बागेश्वर से लगी पिंडर घाटी के दूरस्थ गांव बोरबलड़ा में एक व्यक्ति को पेड़ से गिरने के कारण गंभीर चोटें आई । लेकिन स्वस्थ केंद तक पहुंचने के लिए भी 10 किलोमीटर पगडंडी से मुख्य मार्ग तक पहुंचना ही एक चुनौती भरा काम था । गांव के युवा किसी तरह यह काम कर भी लेते पर गांव में अब युवा रहे ही कहाँ । रोजगार की मार के चलते सारे युवा रोजी रोटी की तलाश में गांव से पलायन कर चुके हैं ( उत्तराखण्ड के कमोवेश सारे गांवों के हालात यही हैं ) अब गांव में बचे हैं तो महिलाएं और बुजुर्ग । ऐसे में बीमार को ले उपचार के लिए ले जाना एक नई चुनौती बन सामने खड़ा हो गया ।

उत्तराखंड के इस गांव की महिलाओं की हिम्मत और जज्बा कि उन्होंने इस चुनौती को भी मात दे कर मरीज को अस्पताल पहुंचने का मन बनाया । उत्तराखण्ड के इतिहास में शायद यह पहला वाकया है जब पलायन की मार के चलते महिलाओं ने किसी मरीज को अपने कंधों में लाद कर 10 किलोमीटर दूर पैदल अस्पताल पहुंचाया होगा ।

अपने ही राज्य में ऐसी जनता की दुर्दशा के लिए पिछले 20 सालों से आती जाती सरकारों का दृष्टि दोष कि उन्हें यह ही नहीं पता कि उनकी किस नीति से गांव कैसे प्रभावित होंगे । पलायन की मार से पर्यटन की जगह बीमार उत्तराखंड वैश्विक पटल छा जाए तो हैरानी की बात नहीं होगी ।

 इस तरह के गांवों के लिए सरकारें किस तरह के आयोजन कर पल्ला झाड़ लेती है इस पर भी एक नजर डाल ली जाए । दिसंबर 2015 में इसी पिंडर घाटी में विशाल सांस्कृतिक एवं पर्यटन मेले का आयोजन हुआ जहां व्वारिष्ठ चिकियस्कों, समाजसेवियों, प्रोफेसरों और रंगकर्मियों को बड़े उत्साह से सम्मानित किया गया । पर सवाल ये है कि क्या इस तरह के कार्यक्रमों से पलायन रुक गया या स्वस्थ सेवाएं बेहतर हो गयी । यहां के 16 गांवों के करीब 20 हजार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को तरस रहे हैं । छोटी बीमारी के लिए भी 20 किलोमीटर भराड़ी और जिला अस्पताल के लिए 120 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है ।

ऐसा नहीं कि राज्य सरकार के पास लोककल्याणकारी योजनाओं के लिए बजट नहीं है पर सवाल तो आती जाती सरकारों के दृष्टिदोष का है कि इसे कहाँ, कैसे और किस नीति के तहत खर्च किया जाएगा । अभी राज्य में स्वाथ्य के लिए 1712 करोड़ का बजट पास हुआ है, पर क्या ये पलायन रोक सकेगा या गांव के गांव खाली होने के बाद वापस कर दिया जाएगा ।

पिंडारी घाटी के  बोरबलड़ा गांव की इस घटना ने उत्तराखण्ड के स्वस्थ की ही नहीं बल्कि यहाँ के नीतिनियन्ताओं के विवेक की तस्वीर भी साफ कर दी है ।

बुधवार, 24 जुलाई 2019

बेईमान कंपनी की लावारिस टाउनशिप



 राज्य में सरकार डबल इंजन की हो या सिंगल इंजन की बेईमानों के लिए पूंजी के जरिये रास्ते हमेशा सुलभ ही रहते है। पूंजी का चरित्र ही ऐसा होता है जो सरकारी मशीनरी को भी अपने रंग में रंग लेता है। आज बात हो रही है ग्राम कोलडा, विनियमित क्षेत्र, जिला उधमसिंह नगर की। जहां बेईमान पूंजीपतियों की एक कम्पनी ने ना केवल काश्तकारों/भू-स्वामियों को बहुत कम रकम देकर जमीन पर टाउनशिप बना कर बेच दी। ये सब लम्बी दास्तान का हिस्सा भर है जहां भू- स्वामियों  को डरा-धमका, मार-पीट कर सब काम आसानी से कर लिया गया क्योंकि सम्बन्धित प्रशासन पीड़ितों के बदले उक्त कम्पनी के पक्ष में खड़ा रहा।

बेईमानी से सारे अनैतिक और असंवैधानिक कामों को अंजाम देने वाली इस कम्पनी का नाम है ‘‘मै. पाल मिनरल इण्डस्ट्री’’। वर्ष 2011 में इस कम्पनी ने जिला उधमसिंह नगर के ग्राम-कोलडा, तहसील किच्छा में एक टाउनशिप बनाने के लिए जमीनें खरीदनी चाही। टाउनशिप के लिए लगभग 44 एकड़ जमीन की जरूरत थी जो किसी एक काश्तकार या भू स्वामी के पास नहीं मिल सकती थी। इसलिये चिन्हिंत जगह पर जो  जमीन दिखी उसमें अलग-अलग पांच काश्तकारों / भू-स्वामियों की जमीनें थी। लिहाजा सबसे बातचीत कर जमीनें खरीदनी थी और फिर जिला विकास प्राधिकरण व अन्य इकाईयों से नक्शा पास करा, व्यावसायिक आदि कर टाउनशिप विकसित करनी थी।यहां हुआ ये कि उक्त कम्पनी मालिक चूंकी पहले भी अन्य शहरों में टाउनशिप विकसित कर चुके थे तो काश्तकार उनके नाम  से उन्हें जमीन बेचने को तैयार हो गये। पर भूस्वामी उनके असल चरित्र से ना वाकिफ थे और ना ही उन्हें ये पता था कि अन्य शहरों के बनाई टाउनशिप में क्या-क्या धांधलिया हुयी है। खैर डील शुरू हो गयी।

करीब 44 एकड़ भूमी में अलग-अलग भू स्वामी थे। 1- रोहताष अग्रवाल जिनकी 19.89 एकड़ जमीन, 2-रामनारायन एवं परिवार जिनकी 14 एकड़ जमीन, 3-विनोद सिंह जिनकी 5 एकड़ जमीन, 4-पृथ्वीपाल गुप्ता जिनकी 4.5 एकड़ जमीन का सौदा ‘‘मै.पाल मिनरल इंडस्ट्री’’ के साथ किसी तरह से हो गया और टाउनशिप  का शुभमुहूर्त तय कर दिया गया। यहां उल्लेखनीय है उक्त टाउनशिप का एक भूभाग उत्तर प्रदेश में आता है। उसे उत्तराखण्ड में जिन नियमों के विरुद्ध इस्तेमाल किया गया यह अलग दास्तां है। वर्ष 2011 से प्लान किये गये इस टाउनशिप को जिन नियम मानकों और शासनादेशों के विरुद्ध जा कर बेचा गया ये एक लम्बी और रोचक दास्तां है। फिलहाल मौजूदा वर्ष 2019 तक ना भू-स्वामी जमीन के भुगतान को तरस रहे है बल्कि प्लाट ग्राहक भी उक्त टाउनशिप में निर्माण नहीं करा पा रहे है। ग्राहक ऐसे फंसे है कि टाउनशिप निर्माताओं की दबंगयी के चलते  उनसे पैसे ले पा रहे और ना ही आगे अपने प्लांट बेच पा रहे है।

वैसे तो किसी भी धंधे में यदि बेईमान कूद पडे तो उसके बचने या फॅंस जाने के लिए सम्बंधित संविधान में ढे़रों नियम-उपनियम, धारायें-उपधारायें मौजूद है। पर काश्तकार और छोटे भू-स्वामियों को सामान्यतया इनका ज्ञान ही नहीं होता है। यदि मुश्किल से कोई जानकारी वो जुटा भी लें तो लड़ेगे कैसे। जब सूरत-ए-हाल ये हो कि सामने वाला दबंग और बत्तमीज हो और जिसके पास शासन-प्रशासन का गुप्त संरक्षण भी हो। इस बड़े मामले के कई छोटे हिस्से इस कहानी में बार-बार आते है। सारी खदीद-फरोख्त हो जाने के बावजूद पिछले 8 सालों से वैधानिक तौर पर अब भी वही का वही, वैसे का वैसा ही है जैसा टाउनशिप की कल्पना के समय रहा होगा। यह इसलिये कहना वाजिब लगता है क्योंकि नक्शे के हिसाब से टाउनशिप का मुख्यद्वार ;परिकल्पना के हिसाब से अभी भी टाउनशिप का हिस्सा है ही नहीं। ये चार सौ बीसी का एक नायाब नमूना कहा जा सकता है। क्योंकि जो शब्जबाग दिखा ‘पाम ग्रीन’ नामक टाउनशिप का प्रचार-प्रसार कर बेईमानी से बेचा गया। धरातल पर टाउनशिप कम्पनी के पास वो प्रापर्टी है ही नहीं.......

इस टाउनशिप के मुख्यद्वार की जमीन तो करीब चार एकड़ है वैसे तो व्यसायिक है जिसका सौदा 8 वर्ष पूर्व, वर्ष 2011 में 10 माह के करार पर हुआ था अब भी लटका हुआ है। यानी कि ये सौदा तब निश्चित की गयी रकम और समयावधी के हिसाब से रद्द हो चुका है। ऐसी सूरत में यह जमीन अब भी ‘मै. पालमिनरल इण्डस्ट्री’ के नाम नहीं हुई है तो मुख्यद्वार का वजूद ही नहीं रहा।

इतनी बड़ी इण्डस्ट्री के मालिकान जो 44 एकड़ पर टाउनशिप विकसित करने का दम रखते है और अन्य शहरों में ऐसे कई माॅडल खडे कर चुके है। मात्र 4 एकड़ जमीन का सौदा पिछले 8 साल से लटकाये हुए है। ये सबको हैरत में डाले हुये है कि कोई पूंजीपति/कम्पनी जिसे भविष्य में भी ऐसे कई और धंधे करने है तो क्यों अपना नाम खराब करने पर आमादा है। टाउनशिप के छोटे मगर बडे महत्वपूर्ण भू-भाग के लिये एसी लापरवाही की दो ही वजह हो सकती है। पहली ये कि - हम भूस्वामी को डरा-धमका कर छल-बल से अंततः जमीन हासिल कर ही लेंगे। हमारे रसूख के आगे शासन-प्रशासन और ग्राहक की हैसियत ही क्या जो हमारा कुछ बिगाड़ लेंगे या इसकी जुर्रत भी करेंगे। दूसरी वजह  है कि कम्पनी उत्तराखण्ड से बोरिया-बिस्तर समेटकर अन्यत्र किसी राज्य में शिफ्ट करने के मंसूबे बना चुकी हो।

इस कम्पनी द्वारा बिछाये जाल की परत दर परत हकीकत जानने के लिये 10 बिंदुओ पर सूचना मांगी गयी थी जिसमें से 5 हासिल हो गयी है और 5 हांसिल होनी बांकी है। चूंकि ये सूचनाएं तहसीलदार किच्छा से आनी है। इसलिये सारी कहानी अभी कहना सम्भव नहीं है।

पर इस बावत सचिव विकास प्राधिकरण पंकज उपाध्याय से यह जानना चाहा कि जिस टाउनशिप के मुख्यद्वार की जमीन ही उक्त कम्पनी के नाम नहीं है तो क्या ये ग्राहकों के साथ चार सौ बीसी नहीं है? क्या उक्त टाउनशिप को गैर कानूनी नहीं माना जाना चाहिए? इस पर सचिव प्राधिकरण ने जो कहा वो काबिल-ए-गौर है। उनका कहना था कि बिना जांच के कोई बात कहना न्याय संगत नहीं होगा। हां यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह से प्रभावित होता है और विकास प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराता है तो नियमानुसार त्वरित कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

कोशिश


सुनो !
बस दो कदम
और चलो मेरे साथ 
मुद्दत से जर्द पड़े
मकान की इन दीवारों पर
फिर कुछ तलाश लें ...


सुनो तो !
ऐसा न करें
कि -
झाड़-बुहार कर
रंग दें इन्हें
और आशियाँ बना लें .....