देवभूमी कहलाने वाले उत्तराखण्ड का स्वस्थ दूर तक ठीक होता नहीं दिख रहा है । शारीरिक और मानसिक स्वाथ्य के आंकड़े बताते आरहे हैं कि हालात ठीक होने के बजाए अभी और भयावह होने वाले हैं । 20 वर्ष के वयस्क उत्तराखण्ड को नीति नियंताओं की जनविरोधी नीतियों ने कुपोषित कर डाला है । स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर शासन की उदासीनता के रोज नए परिणाम सामने आ रहे है, जिससे जनमानस के माथे की लकीरें गहरी हो चिंता और अवसाद की तरफ ले धकेल रही हैं ।
राज्य के अविकसित गांवों में स्वाथ्य सेवाओं का हाल ये है कि बीमार लोगों को ईलाज के लिए कई किलोमीटर कुर्सी या चारपाई की डोली में किलोमीटरों पैदल चल अस्पताल ले जाना पड़ता है । पर हालात अब इतनी खराब स्थिति तक ही नहीं नहीं रहे बल्कि और ज्यादा बिगड़ चुके है ।
मौजूदा हालात स्वस्थ के साथ पलायन के दर्द की कहानी भी बयां करने लगे हैं । अभी इसी सप्ताह के भीतर एक घटना घटी जिसकी तस्वीर एकदम साफ नजर आई है । इस घटना से लोग राज्य के हालात ठीक से समझ सकते हैं ।
घटना के मुताबिक बागेश्वर से लगी पिंडर घाटी के दूरस्थ गांव बोरबलड़ा में एक व्यक्ति को पेड़ से गिरने के कारण गंभीर चोटें आई । लेकिन स्वस्थ केंद तक पहुंचने के लिए भी 10 किलोमीटर पगडंडी से मुख्य मार्ग तक पहुंचना ही एक चुनौती भरा काम था । गांव के युवा किसी तरह यह काम कर भी लेते पर गांव में अब युवा रहे ही कहाँ । रोजगार की मार के चलते सारे युवा रोजी रोटी की तलाश में गांव से पलायन कर चुके हैं ( उत्तराखण्ड के कमोवेश सारे गांवों के हालात यही हैं ) अब गांव में बचे हैं तो महिलाएं और बुजुर्ग । ऐसे में बीमार को ले उपचार के लिए ले जाना एक नई चुनौती बन सामने खड़ा हो गया ।
उत्तराखंड के इस गांव की महिलाओं की हिम्मत और जज्बा कि उन्होंने इस चुनौती को भी मात दे कर मरीज को अस्पताल पहुंचने का मन बनाया । उत्तराखण्ड के इतिहास में शायद यह पहला वाकया है जब पलायन की मार के चलते महिलाओं ने किसी मरीज को अपने कंधों में लाद कर 10 किलोमीटर दूर पैदल अस्पताल पहुंचाया होगा ।
अपने ही राज्य में ऐसी जनता की दुर्दशा के लिए पिछले 20 सालों से आती जाती सरकारों का दृष्टि दोष कि उन्हें यह ही नहीं पता कि उनकी किस नीति से गांव कैसे प्रभावित होंगे । पलायन की मार से पर्यटन की जगह बीमार उत्तराखंड वैश्विक पटल छा जाए तो हैरानी की बात नहीं होगी ।
इस तरह के गांवों के लिए सरकारें किस तरह के आयोजन कर पल्ला झाड़ लेती है इस पर भी एक नजर डाल ली जाए । दिसंबर 2015 में इसी पिंडर घाटी में विशाल सांस्कृतिक एवं पर्यटन मेले का आयोजन हुआ जहां व्वारिष्ठ चिकियस्कों, समाजसेवियों, प्रोफेसरों और रंगकर्मियों को बड़े उत्साह से सम्मानित किया गया । पर सवाल ये है कि क्या इस तरह के कार्यक्रमों से पलायन रुक गया या स्वस्थ सेवाएं बेहतर हो गयी । यहां के 16 गांवों के करीब 20 हजार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को तरस रहे हैं । छोटी बीमारी के लिए भी 20 किलोमीटर भराड़ी और जिला अस्पताल के लिए 120 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है ।
ऐसा नहीं कि राज्य सरकार के पास लोककल्याणकारी योजनाओं के लिए बजट नहीं है पर सवाल तो आती जाती सरकारों के दृष्टिदोष का है कि इसे कहाँ, कैसे और किस नीति के तहत खर्च किया जाएगा । अभी राज्य में स्वाथ्य के लिए 1712 करोड़ का बजट पास हुआ है, पर क्या ये पलायन रोक सकेगा या गांव के गांव खाली होने के बाद वापस कर दिया जाएगा ।

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