| संचुरी पल्प एंड पेपर मिल, लालकुवां,जिला नैनीताल |
अपनी स्थापना से ही विवादों मे रहे ‘सेंचुरी पल्प एण्ड पेपर मिल’ में 24
अगस्त में नया मोड़ आ गया। ये एतिहासिक · दिन तब अचानक आया जब ‘पिपुल्स फोर एनिमल संस्था की एक प्रतिनिधि गौरी मौलेखी ,सूचना कार्यकर्त्ता गुरविन्दर चढ्ढा ·के साय बरेली रोड से गुजर रही थी। सड़क पर एक वाहन को उन्होंने रासायनिक कचरा ढोते हुए देखा,पूछने पर पता चला ·कि यह रासायनिक कचरा पेपर मिल से पाल स्टोन क्रशर तक पहुंचाया जा रहा था। इस घटना से हैरान हो गौरी मौलेखी वाहन को हल्द्वानी कोतवाली ले आयी और मिल प्रबन्धन के खिलाफ तहरीर दी। पुलिस ने धारा 268 और 269 (मानकों की अवहेलना और किसी बुरे काम से जनता की जान को खतरे में डालना) के तहत मुकदमा पंजिकृत कर दिया। 25 जुलाई का दिन भी इस प्रदूषण के कारोबारियों की औपचारिक जांच के नाम रहा। गौरी मौलेखी ,गुरविन्दर सिंह चढ्ढा व अन्य सुबह 10 बजे लालकुआं थाने पहुचे और तहरीर दी। साथ ही साथ उपजिलाधिकारी हरवीर सिंह और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि भी मौके पर पहुंचे। जहां घोड़ानाला में बह रहे एक नाले व एक प्राइमरी विद्यालय से पानी की सैम्पलिंग की गयी। बताया जा रहा है कि ‘पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय हल्द्वानी ही इस पानी की जॉच अपनी प्रयोगशाला में करेगा। इस पूरे मामले में दो बातें सभी को हैरान कर रही है। पहली यह कि पानी की जांच खुद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड करेगा। जिसके सरंक्षण के चलते पेपर मिल प्रबन्धन प्रदूषण परोस रहा है। दूसरी ये कि मिल के प्रशासनिक अधिकारी एम.पी. श्रीवास्तव का यह बयान कि मिल से निकलने वाले रासायनिक कचरे का जिम्मा संबधित ठेकेदार का है, इससे मिल का कोई लेना देना नहीं हैं। तीन दशकों से प्रदूषण का पर्याय बनी ‘सेंचुरी पल्प एण्ड पेपर मिल’ के प्रदूषण परोसने की दास्तां इतनी लम्बी और जटिल हैकि एक ही बार में पाठकों को समझने में मुश्किल हो सकती हैं, इस दास्तान आसन कर लिखने का प्रयास कर रहे हैं .......
एक नजर पृष्ठ भूमि पर -
80 के दशक
में उत्तराखण्ड की
तराई में उघोग लगाने की
नई मुहिम शुरू हुई। लोगों को लगता था कि
नये औघोगिक वातावरण से क्षेत्र के विकास के साथ -साथ युवाओं को रोजगार के रास्ते खुलेगें। सरकार ने तराई को उद्योगों से पाटने के लिए स्थानीय लोगों को जो सपने दिखाये थे वे साकार होना तो दूर,खतरना हकीकत के रूप में सामने आये हैं। नैनीताल जनपद के लालकुंआं क्षेत्र के
पास 50 के दशक में बिन्दुखत्ता क्षेत्र की
बसावत उत्तर प्रदेश के तत्लीकान मुख्यमंत्री पं.गोविन्द बल्लभ
पन्त की अगुवई में
22 गांवों की स्थापना के रूप में हुई।
राजीव नगर
,गांधी नगर,पटेल नगर,इंद्र नगर,सुभाष नगर,संजय नगर,चित्रकूट,रावत नगर,तिवारी नगर ,खुरिया खत्ता,बोरिंग पट्टï,हल्दूधार,घोड़ानाला ,कार रोड,शांति नगर,विकास पुरी, हाटाग्राम,शीशम भुजिया,शिव पुरी,शास्त्रीय नगर,टैंट चौराहा,बाजपुर चौराहा और कलिका मन्दिर जैसे गांव मिलकर बिन्दुखत्ता कहलाये। क्षेत्र वासियों ने संयुक्त प्रयास से यहां अस्पताल ,स्कूल और डेरी उत्तपादन आदि से ग्रामीण विकास से नई यात्रा शुरू की । इस बीच सरकार ने इस क्षेत्र को औद्योगिक विकास के नाम से प्रचारित करना शुरू किया।
वर्ष 1980 में क्षेत्र के
72 परिवारों को बेदखल कर बिरला समूहों के उघोग ‘सेन्चुरी पल्प एण्ड पेपर मिल’की स्थापना लालकुंआं में की गई। इसकी स्थापना के समय क्षेत्र के लोगों को रोजगार एवं अन्य सुविधाओं का अश्वासन दिया गया। लेकिन मिल के निर्माण और इसमे उत्पादन शुरू होते ही पूरा क्षेत्र रसायन युक्त विषैले पानी की चपेट मे आ गया। और धीरे-धीरे
पीने के पानी, मवेशियों व सिंचाई के
लिए यह रसायन युक्त पानी अभिशाप बन गया। हालात इतने खराब हो गये कि,
खेतों ·की उर्वरक क्षमता समाप्त होने के साथ साथ हैंडपम्प से निकलने वाला पानी भी पीने लायक नहीं रहा। जल और वायु प्रदूषण इस कदर हावी हो गया कि लोगों को खुजली,सांस और पेट के गंभीर रोग होने लगे।
प्रशासन के मूक रहने पर क्षेत्रवासियों ने मिल के खिलाफ पहली बार वर्ष 1984 में अनिश्चित कालीन धरने की शुरूवात,जिसने कुछ ही दिनों में एक लम्बे आंदोलन का रूप ले लिया। फलस्वरूप तत्कालीन
उपजिलाधिकारी शकुंतला गौतम ने एक समिति का गठन कर क्षेत्र ·का दौरा किया और दस हैण्डपम्पों से पानी के नमूने लेकर पंतनगर विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में जांच कराई । इन
10 नमूनों में से 8 नमूनों की रिपोर्ट सकारात्म·(विषाक्त) निकली। पर इस रिपोर्ट को भी सार्वजनिक नहीं किया गया। और इसी बीच शकुन्तला गौतम का तबादला हो गया। जहां वर्ष 1993 में मिल में कार्यरत एक
22 वर्षीय ध्याड़ी मजदूर बुलाकी कोरी की
ट्रीटमैंट प्लांट में गिरने से मौत हो गयी। वहीं वर्ष 1997 में कीर्ती बल्लभ के
8 वर्षीय पुत्र को मिल के विषाक्त नाले
ने लील लिया। मवेशियों का विषाक्त नाले में डूब कर मरना अब एक आम बात हो चली। इस एक
दशक बीत जाने के बाद भी मिल प्रबन्धन का रवय्या बदला और ना ही स्थानीय प्रशासन का । क्षेत्रवासियों का आक्रोष बढ़ता गया और फिर वर्ष 2005 में स्थानीय युवाओं ने
‘उत्तराखण्ड बेरोजगार संगठन के बैनर तले व्यापक आंदोलन चलाया। ये आंदोलन पिछले आंदोलनों से सदृड़ था इसमें संगठन ने 4 मूलभूत बिन्दुओं को लेकर अपनी मांग रखी। 1- मील से निकलने वाले नाले को भूमिगत किया जाये। 2-विषाक्त पानी से प्रभावित किसानों को मिल में नौकरी दी जाये। 3-शकुन्तला गौतम की रिपोर्ट को सार्वजनिक कीया जाये और 4-प्रदूषण रोकने को आवश्यक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाये।
इन बिन्दुओं पर मिल प्रबन्धन और आंदोलनकारियों के बीच स्थानीय प्रशासन की मौजूदगी में
3 नवम्बर 2005 को लिखित समझौता हुआ। इन मांगों के आश्वासन पर आंदोलन खत्म तो हो गया, पर मिल प्रबन्धन अपनी फितरत से बाज नहीं आया और एक नयी बात शुरू कर दी। प्रबन्धन ने कहा कि-
मिल के अंदर ई.टी.पी.
प्लांट स्थापित कर विषाक्त पानी की रिसय्किलिंग कर शुद्घ करने की व्यवस्था कर दी गई है। अब नाले को भूमिगत बनाने का कोई औचित्य नहीं बनता। तब से आजतक हालात यही है। मिल प्रबन्धन खर्चीले ई.टी.पी.
प्लांट को तभी चलाता है,जब स्थानीय लोग और प्रशासन सक्रीय होते है।। मिल प्रबन्धन की इस मनमानी पर 28 अगस्त 2010 को संगठन ने फिर मोर्चा खोल दिया । जिस पर मिल प्रबंधन आंदेकालनकारियों को सहमत करने की जुगत मे लगा रहा कि
20 किलोमीटर लम्बे नाले को भूमिगत करना संभव नहीं हैं,फिलहाल इसे 650 मीटर भूमिगत किया जा सकता है। लेकिन आज तक यह भी नहीं हो पाया है। उल्टा अब मिल प्रबन्धन रासायनिक कचरा भी ठेकेदारों की मदद से मिल केबाहर फिकवा रहा है। मिल के अंदर की अव्यवस्थाओं जैसे गैर कानूनी तरीकों से प्लांट चलाने आदि पर आगे चर्चा करेंगे। अभी बात करते है। रासायनिक कचरे की।
दशकों बाद आया नया मोड़--
ये भी एक इत्तेफा· है कि 24
अगस्त 2010 के ठीक 3 साल बाद 24 अगस्त
2013 में मिल प्रबन्धन के खिलाफ एक और मोर्चा खुल गया। यह मोर्चा खोला है,सूचना कार्यकर्त्ता गुरविन्दर सिंह चढ्ढा और ‘पीपुल्स फॉर एनिमल’ नाम· संस्था की सदस्य सचिव गौरी मौलेखी आदि ने। पिछले 3 दशकों में यह नयाब मोड़ है,जब क्षेत्रवासियों से इतर मिल से उत्पादित प्रदूषण को लेकर व्यक्तिगत तौर पर कोई सार्थक पहल देखने में आयी है। इस पहल से क्षेत्रवासियों को कितनी राहत मिलेगी या दशकों से मनमानी करते आये मिल प्रबन्धन पर ‘पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’,वन विभाग,सिंचाई विभाग,श्रम विभाग और स्थानीय प्रशासन नकेल डालेगा या नहीं ,ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा,बहरहाल दशकों बाद आये इस नये मोड़ से क्षेत्र की जनता उत्साहित है।
https://www.facebook.com/Samanantar/posts/496271533773685
जवाब देंहटाएंअच्छी रिपोर्ट प्रस्तुत की है
जवाब देंहटाएं