शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

उत्तराखण्ड में Corona Warriors पर भारी पड़ सकते है The Corona Carrier


दुनियां भर में कोरोना वायरस की पहेली अभी ठीक से सुलझी ही नहीं पाई है इसीलिए सावधानी ही बचाव का एक मात्र विकल्प बन कर उभरा है । हर देश और देश के अलग अलग राज्य अपने अपने ज्ञान, विवेक और तकनीक से कोरोना से जीतने को आगे पीछे दौड़ ही रहे हैं । इस दौड़ में वही देश या वही राज्य थोड़ा आगे हैं जो अपनी आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक संरचना को समझ - जान कर कदम आगे बढ़ा रहे हैं ।

इस परिपेक्ष्य में उत्तराखंड को देखा जाए तो एक बड़ी समस्या राज्य के सामने यह है कि यहां कोरोना वॉरियर्स से ज्यादा यहां कोरोना कैरीयर्स ( वाहक ) मौजूद हैं । कौन हैं ये कोरोना कैरीयर्स जो कथित वॉरियर्स पर भारी पड़ सकते हैं । ये वो हैं जिनकी अनदेखी जाने - अनजाने नीतिनियन्ताओं द्वारा की जा रही है । एक तरफ तो कोरोना के डर से अस्पतालों में स्वाभाविक मौत मरने वालों का पोस्टमार्टम किया जा रहा है और दूसरी तरफ जो कोरोना के आदर्श वाहक हो सकते हैं उन पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है ।

कोरोना महामारी में ये तो साफ ही है कि इसके संक्रमण के लिए वो रोगी आदर्श वाहक हैं जो चेतनहीनता के चलते कहीं भी खांसते, छीकते या अन्य तरीकों से संक्रमण फैलाने में मददगार होते हैं । इन्ही की अनगिनत संख्या का राज्य को ना अनुमान है और ना ही इनके आदर्श वाहक होने आंकलन किया गया है ।


ये हैं राज्य में दो दशकों से गुणात्मक वृद्धि करते स्मैक और इंजेक्शन के नशे में डूबे युवा । राज्य में इनकी  बढ़ती तादात के बारे में आगे बात करेंगे पहले इनके कोएना वायरस के लिए आदर्श वाहक होने पर चर्चा कर लेते हैं । मनोवैज्ञानिक डॉ युवराज पंत कहते हैं कि - 'पहला तो यह कि खाँसी, छिक, आंखों और नाख ने पानी निकलना इनको संक्रमण  फैलाने के पहले पायदान में रखता है, फिर नशे के आदि होने के चलते ये किसी सामाजिक बैरियर या किसी भी तरह की मूल्य मान्यताओं और नैतिकता को नहीं मानते । ऐसा इसलिए होता है कि ये नशा ना मिले तो इन्हें नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, मांसपेशियों में बहुत दर्द होता है जिससे ये चिढ़चिढ़े और हिंसक हो जाते हैं' ।

डॉ युवराज आगे बताते हैं कि - 'ऐसे में कोई स्मैक का नशेड़ी युवा कोरोना पोजेटिव हुआ तो क्या कयामत हो सकती है इसे समझने के लिए यह जान लें कि ये नशा कोई अकेले नहीं करता बल्कि समूह में किया जाता है जिसके सदस्य जगह और परिस्थिति के हिसाब से बदलते भी रहते हैं । ऊपर से इनका तमाम बंधनों से मुक्त जीवन कोढ़ में खाज का काम करेगा, लॉक डाउन या सोशियल डिस्टनसिंग तो इनके लिए कोई मायने नहीं रखता है क्योंकि नैतिकता का मामला गौण है और पिटाई का कोई असर इन पर होता नहीं है' ।

उत्तराखंड में इनकी तादात पर एक नजर डालें तो स्मैक के पहले मरीज की पुष्टि  वर्ष 1999 में हुई, ये गौला नदी में खनन कार्य करने वाला एक मजदूर था । ये संख्या लगातार बढ़ती गई और पहले इसमें अधिकांश संख्या 30 से 40 वर्ष के युवाओं की रही फिर ये 15 से 40 के बीच आगई । ऐसा होने के लिए मौजूद व्यवस्था में कई कारण मौजूद है जैसे आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और अन्य कई, पर इसमे  फिर कभी चर्चा करेंगे ।

वैसे इनकी तादात का सही ब्यौरा राज्य सरकार के पास होना चाहिए पर जिस राज्य में 20 साल बाद भी 'मानसिक स्वास्थ्य नीति'  नहीं बनी वहां ऐसी उम्मीद ही बेमानी है । नशा मुक्ति केंद बताते हैं कि सटीक ब्यौरा 'समाज कल्याण विभाग' के पास होगा ।समाज कल्याण विभाग इससे अनभिज्ञता जताता है, स्वस्थ विभाग को ये प्रश्न ही पहेली जैसा लगता है, पुलिस प्रशासन के पास कुछ आंकड़े है  भी तो कुछ नशेडियों और तस्करों के मिलेजुले ।


नैनीताल जिले के हल्द्वानी में दो राजकीय चिकित्सालयों के अलावा 4 नशा मुक्ति केंद्र हैं इनके आधार पर कोई सटीक आंकड़ा सामने नहीं आता मगर कुछ गौर तो किया ही जाए । इन अस्पतालों में हर रोज एक मरीज स्मैक का आता है यानी 6 अस्पतालों में स्मैक के 6 मरीज रोजाना मानें तो साल भर में करीब 2 हजार से ज्यादा मरीज । ये है सिर्फ एक शहर की बात, हांलाकि इसमें कुछ संख्या कुमाऊं के अन्य गांवों के मरीजों की भी होती है पर ये आंकड़ा भी कम भयावह नहीं है जिनकी तादात में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही हो ।

इससे उत्तराखंड के अन्य शहर, गांव और जिलों की स्थिति का अंदाजा लगाना आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं है  ।  डॉ युवराज पंत कहते हैं कि - 'कोई शक नहीं कि ऐसे पेशेंट कोरोना संक्रमण के लिए आइडियल वाहक है ऐसे में यदि स्मैक के किसी भी नशेड़ी को कोरोना होता है तो हिंसक मगर एकाकी नशेड़ी ना खुद जान पाएगा ना ही किसी को उसके संक्रमण चक्र के बारे में कुछ पता चल पाएगा' ।

कोरोना से जंग को तैयार सरकार द्वारा सेवा में लगे कोरोना वॉरियर्स इनसे कैसे निपटेंगे क्योंकि इस सवाल ने नीतिनियन्ताओं के मष्तिस्क में दस्तक भी नहीं दी है । मुस्तैदी के रूप में स्वाभाविक मौत पर कोरोना की पुष्टि के लिए पोस्टमार्टम तो किया जा रहा पर स्मैक के नशेडियों के पकड़े जाने पर उनका कोएना टेस्ट अब भी नहीं किया जा रहा है । 

इस बाबत जब हमने  हल्द्वानी में पकड़े गए दो स्मैकियों की जानकारी सब इंस्पेक्टर राहुल राठी से ली तो उन्होंने बताया कि पकड़े गए स्मैकिये जमानत पर रिहा किए गए इसलिए उनका कोरोना टेस्ट नही कराया गया, हां यदि उन्हें तो क्या किसी को भी जेल भेजा जाता तो कोरोना टेस्ट कराया जाता । ऐसे में कोरोना संक्रमण के लिए आदर्श वाहकों की जाने अनजाने अनदेखी कोरोना वॉरियर्स पर भारी पड़ सकती है ।

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