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एक ही छत के नीचे सस्ता और सुलभ इलाज का ढोल पीटने वाले कृष्णा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के मालिक डा. खुराना की असलियत पर मीडिया लाख पर्दा डाले. लेकिन हकीकत है कि अस्पताल की खामोश दीवारों से बाहर आ ही जाती है. इस बार इसका गवाह बना है, अस्पताल का दड़बा नंबर-26 (जिसे प्राइवेट वार्ड कहा जाता है) यहाँ दमुवांढूंगां निवासी दीपू अपने अल्सर का आपरेट करा घर जाने की प्रतीक्षा में परिवार सहित इसलिए घुट रहा है, क्यौंकी अस्पताल प्रशासन ने उसके इलाज पर आई लागत को 4 गुना वसूलने की ठान ली है.
हुआ यूँ कि दमुवाढूगां निवासी दीपू लम्बे समय से पेट दर्द पीड़ित था, घर की माली हालत देखते हुए उसने ये बात अपने परिजनों से साझा नहीं की. दर्द जब हद से ज्यादा बढ़ गया तो वह अपने कुछ दोस्तों के साथ कुसुमखेडा, हल्द्वानी स्थित सेंट्रल हास्पिटल पहुंचा, जहाँ चिकित्सकों ने आप्रेशन की बात कही. पर इस आलीशान से दिखने वाले अस्पताल में आप्रेशन के खर्च का अनुमान लगा दोस्त भी दीपू को वहीँ छोड़ चल दिये.
दीपू के घर परिजनों को पता चलने पर वे दीपू को कृष्णा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ले आये(जहाँ सस्ते और सुलभ इलाज का खूब प्रचार है) यहाँ अस्पताल में दीपू के परिजनों को बताया गया कि उसके पेट का अल्सर फट गया है, तुरंत आपरेशन नहीं किया गया तो उसकी जान चली जाएगी. आपरेशन थियेटर में ले जाते वक़्त कहा गया की 50000(पचास हजार ) जल्द से जल्द जमा करवाये जाएं. दीपू के परिजनों ने आपरेशन करने वाले डाक्टर से विनती की तो उन्होंने अपनी फीस माफ़ करने का वादा किया.
लेकिन आप्रेशन के बाद अब अस्पताल प्रशासन 2.5 लाख रुपयों के इंतजाम का दबाव बना रहा है. दीपू की मौंसी रेखा ने बताया कि दीपू के पिता नहीं हैं, और माँ घरों में चौका-बर्तन कर बच्चों को पढ़ा रही है, ऐसे में 5 गुना ज्यादा रकम कहाँ से जुटायें. जिस दड़बा नंबर—26 में दीपू भर्ती है, वहां आम आदमी दुर्गन्ध शायद ही रह पाए.दडबे में A.C. जरूर है, पर वेंटिलेशन और कमरे का साइज सबको अस्पताल की हकीकत से रु-ब-रु करा देगा. जाने किस मेडिकल मेनुअल और गाइड लाइन के तहत अस्पताल की स्थापना की गयी है (ये शोध का विषय है ) ..लेकिन अस्पताल की हकीकत मरीज ही बयाँ कर सकते है
हल्द्वानी निवासियों को एक बार अस्पताल के दड़बा नंबर—26 में जाना ही चाहिए. दीपू के परिजन अस्पताल को 12000+25000+15000+10000 = 62000 (बासठ हजार रूपये) दे चुके हैं, बांकी मनमांगी रकम देने में वो असमर्थ हैं. जो दीपू के परिवार की मदद कर सकता हो या........... दड़बा नम्बर—26 में जरूर जाये.
हुआ यूँ कि दमुवाढूगां निवासी दीपू लम्बे समय से पेट दर्द पीड़ित था, घर की माली हालत देखते हुए उसने ये बात अपने परिजनों से साझा नहीं की. दर्द जब हद से ज्यादा बढ़ गया तो वह अपने कुछ दोस्तों के साथ कुसुमखेडा, हल्द्वानी स्थित सेंट्रल हास्पिटल पहुंचा, जहाँ चिकित्सकों ने आप्रेशन की बात कही. पर इस आलीशान से दिखने वाले अस्पताल में आप्रेशन के खर्च का अनुमान लगा दोस्त भी दीपू को वहीँ छोड़ चल दिये.
दीपू के घर परिजनों को पता चलने पर वे दीपू को कृष्णा हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ले आये(जहाँ सस्ते और सुलभ इलाज का खूब प्रचार है) यहाँ अस्पताल में दीपू के परिजनों को बताया गया कि उसके पेट का अल्सर फट गया है, तुरंत आपरेशन नहीं किया गया तो उसकी जान चली जाएगी. आपरेशन थियेटर में ले जाते वक़्त कहा गया की 50000(पचास हजार ) जल्द से जल्द जमा करवाये जाएं. दीपू के परिजनों ने आपरेशन करने वाले डाक्टर से विनती की तो उन्होंने अपनी फीस माफ़ करने का वादा किया.
लेकिन आप्रेशन के बाद अब अस्पताल प्रशासन 2.5 लाख रुपयों के इंतजाम का दबाव बना रहा है. दीपू की मौंसी रेखा ने बताया कि दीपू के पिता नहीं हैं, और माँ घरों में चौका-बर्तन कर बच्चों को पढ़ा रही है, ऐसे में 5 गुना ज्यादा रकम कहाँ से जुटायें. जिस दड़बा नंबर—26 में दीपू भर्ती है, वहां आम आदमी दुर्गन्ध शायद ही रह पाए.दडबे में A.C. जरूर है, पर वेंटिलेशन और कमरे का साइज सबको अस्पताल की हकीकत से रु-ब-रु करा देगा. जाने किस मेडिकल मेनुअल और गाइड लाइन के तहत अस्पताल की स्थापना की गयी है (ये शोध का विषय है ) ..लेकिन अस्पताल की हकीकत मरीज ही बयाँ कर सकते है
हल्द्वानी निवासियों को एक बार अस्पताल के दड़बा नंबर—26 में जाना ही चाहिए. दीपू के परिजन अस्पताल को 12000+25000+15000+10000 = 62000 (बासठ हजार रूपये) दे चुके हैं, बांकी मनमांगी रकम देने में वो असमर्थ हैं. जो दीपू के परिवार की मदद कर सकता हो या........... दड़बा नम्बर—26 में जरूर जाये.

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